पति-रिश्तेदारों को अब सरपंची करना पड़ेगा भारी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन में मंत्रालय ने उठाए कदम
राकेश बिकुन्दिया, सुसनेर। पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं को मिले आरक्षण का लाभ असल में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों को नहीं मिल पा रहा है। इसीलिए पंचायत मंत्रालय ने महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए महिला सरपंच की आड़ में सरपंच करने वाले उनके पतियों व अन्य रिश्तेदारों पर जुर्माना व दंडात्मक कार्रवाई की दिशा में कदम उठाया है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन में मंत्रालय द्वारा गठित समिति ने पंचायती राज प्रणालियों और संस्थाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व और उनकी भूमिकाओं में परिवर्तन प्रॉक्सी भागीदारी के प्रयासों को समाप्त करना नामक रिपोर्ट तैयार की है। जिसे मंत्रालय ने मंजूर कर लिया है।
सुसनेर विकासखंड में जनपद पंचायत सुसनेर के अंतर्गत आने वाली 61 ग्राम पंचायतों में से लगभग 50 फीसदी सीटों पर महिला सरपंच निर्वाचित हैं, इनमें से अधिकांश पंचायतों में उनकी कुर्सी पर उनके पति या अन्य रिश्तेदार काबिज होकर सरपंची कर रहें हैं। प्रतिनिधि सरपंची को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा बढ़ाया जा रहा कदम इसलिए सही माना जा सकता है, क्योंकि जमीनी स्तर पर हालत खराब है। पंचायतीराज में महिलाओं को मिले अधिकार का हनन उन्हीं के प्रतिनिधि सरपंची करके कर रहें हैं।
फील्ड से लेकर ऑफिस वर्क सरपंच पतियों के पास
पंचायत को लेकर जमीनी हालात बेहद खराब है। महिला सरपंच घर का काम संभालती है और बाहर उनके पति सरपंची कर रहें हैं। इनमें योजनाओं से लेकर बिल पास कराने के लिए अधिकारियों से बात करने से लेकर ऑफिस संबंधी काम महिला सरपंचों के प्रति या उनके रिश्तेदार संभालते हैं। कई बार तो ग्राम सभाओं तक में महिला सरपंच के साथ उनके पति देखे गए हैं।
इधर, नगरीय निकायों में भी हालात खराब
सिर्फ गांव ही नहीं निकाय क्षेत्र में भी हालात खराब है। बात सुसनेर विधानसभा क्षेत्र के नगरीय निकाय नलखेडा, सुसनेर, बडागांव और सोयतकलां में की करें तो यहां भी नपाध्यक्ष सहित महिला पार्षदों की आड़ में उनके पति पार्षदी कर रहें हैं। महिला पार्षद फील्ड में नजर तक नहीं आती।
जनपद एवं प्रशासन की बैठकों में भी पति शामिल
हालत यह है कि जब भी किसी शासकीय योजना के क्रियान्वयन को लेकर या कोई आयोजन को लेकर प्रशासन एवं जनपद के द्वारा बैठक आयोजित की जाती है तो इसमें महिला सरपंच की जगह उनके पति एवं रिश्तेदार ही बैठक में हिस्सेदारी करते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है की प्रशासनिक अधिकारी भी इन्हें ही असल सरपंच मानकर के इनका सम्मान भी करते नजर आते है।
नियमानुसार महिला जनप्रतिनिधि का कार्यभार उनके पति या अन्य कोई रिश्तेदार नहीं संभाल सकते। ऐसा करने पर कार्रवाई का प्रावधान है।
राजेश शाक्य
सीईओ, जनपद पंचायत सुसनेर।
