घर-परिवार की आरोग्यता के लिए होलिका की भस्म को साल भर रखा जाता है घरों में
राकेश बिकुन्दीया, सुसनेर। होलिका दहन के बाद होली शुरू हो जाती है, लेकिन देश में होलिका दहन को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं, इनमें से कुछ अजीब भी हैं। ऐसी ही एक प्रथा मालवा क्षेत्र में भी प्राचीन समय से चली आ रही है। होलिका दहन के बाद घरों में आग लाने की परंपरा है। माना जाता है कि यह नई अग्नि होती है। अग्नि को धधकते हुएं अंगारो के साथ घर पर लाने से सुख-समृद्धि आती है।
होलिका दहन का मालवा क्षेत्र में खास महत्व होता है। इस दिन होलिका की आग में जहां रोग, द्वेष व बुराइयां नष्ट हो जाती है। वही उसकी भस्म का भी बहुत महत्व है। जलती हुई होली में से लोग भस्म व धधकते हुए अंगारे घर लेकर जाते है और इसी से घर का चूल्हा जलाते है। होलिका की भस्म को साल भर घर में रखा जाता है। यह परम्परा प्राचीनकाल से चली आ रही है। आगर मालवा समेज सुसनेर व ग्रामीण अंचल में लोग परंपरागत तरीके से होलिका की आग को घर ले जाते हैं और उसी आग से चूल्हा जलाया जाता है। इसके बाद यहां इस आग को साल भर बुझाया नहीं जाता है। बल्कि होलिका की आग से जलाया गए चूल्हे की आग को राख में गाड़कर रखा जाता है और अगले दिन फिर इसी आग से चूल्हा जलाया जाता है। इस प्रकार साल भर एक ही आग से चूल्हा जलाने की परंपरा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में देखी जाती है।

प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिए होलिका दहन
होलिका दहन से आरोग्यता आती है। राक्षस प्रवत्तियों का नाक्ष होता है, वातावरण सुंगधित होता है यह कहना है नगर के पंडित गोविंद शर्मा का। वे कहते है आज रात्रि में शुभ मुहूर्त मंे होलिका का दहन होगा। वही अगले दिन धुलेंडी की सुबह से ही रंग- गुलाल का उडना शुरू हो जाएगा। लोग प्रेम के साथ एक दुसरे को रंग लगाएंगे। उन्होने बताया की प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के लिए होलिका दहन किया जाता है।
यह कथा है प्रचलित
शास्त्रो के अनुसार ढुंढा नामक राक्षसी प्राणियों को पीडा पहुंचाया करती थी। उसके प्रभाव से अन्न, गेहूं, चना जौ आदि की फसलो को किडे नुकसान पहुचाते थे। पीडित लोग एकत्रित हुएं और तृणकष्ठ की विशाल ज्वाला से उस राक्षसी को भयभीत कर दिया। राक्षसी उस क्षेत्र से पलायन कर गई और उस क्षेत्र का सुरक्षा मिली तभी से होलिका दहन प्रारंभ हुआ। संयोग से इसी पूर्णिमा में होलिका ने जलती हुई ज्वाला में भक्त प्रहलाद को लेकर प्रवेश किया और होलिका जल गई व प्रहलाद बच गया। एकता और प्यार का यह त्यौहार होली इस बार भी बडी धूमधाम के साथ मनाया जाएगा।
होलिका की आग से घरों में चूल्हा जलाने की परंपरा आज भी जीवित है। लोगो के घरों में चूल्हे की जगह भले ही गैस चूल्हे ने ले ली हो लेकिन घर-परिवार की आरोग्यता के लिये लोग होली के दिन भस्म और अंगारे जरूर घर पर ले जाते है।
पण्डित गोविंद शर्मा
ज्योतिषाचार्य सुसनेर।
